Sunday, 16 August 2015

अभी कुछ दिनों पहले की ये बात लगती है

अभी कुछ दिनों पहले की ये बात लगती है,
कुछ अधूरे से दिन और अधूरी सी ये रात लगती है
कुछ भी ना बाकी है अब कहने सुनने को,
फिर भी किसी नए किस्से की शुरुवात लगती है।। 

ये बेज़ुबां लम्हे भी कुछ कहना चाहते हैं,
तेरे मेरे बीच कुछ देर रहना चाहते हैं,
उम्र बिता दी है साथ तेरे मैंने,
फिर भी बहुत छोटी यह मुलाकात लगती है।।

उन नन्ही सी कलियों का खिलना बाकी है,
वो भटकते परिंदों का मिलना बाकी है,
यह आस्मां भी मिल गया है झुक कर इस सागर में,
यह इस कायमनात की हमारे लिए सौगात लगती है।। 

मैंने ओस की बूंदों  को जलते देखा है,
और सूरज की आँखों में आंसू को देखा है,
यह पलके जैसे गुलाब की चादर बिछाये बैठी हैं,
यह तुझसे मिलने को बहुत बेताब लगती हैं।।

कहानियां इश्क़-आशिक़ी के खूब सुनी हैं हमने,
सपनो में फरिश्तों की कहानियां बुनी है हमने,
चार कदमों  का यह सफर जैसे परियों का शहर लगता है,
यह सब हम पर लिखी हसीं किताब लगती है।।

अभी कुछ दिनों पहले की ये बात लगती है...


Saturday, 13 December 2014

मैं आतंकवाद से नहीं डरता

आज मैं भरी महफ़िल में ये एलान करता हूँ,
की मैं इस कायर आतंकवाद से नहीं डरता हूँ। 
मैं ही इनके हमले में तिल-तिल के मरता हूँ,
फिर भी यूँ बिखर कर मैं हर बार संभालता हूँ,
ये आतंकी फैलाते दहशत हज़ारों में,
ये आतंकी फोड़ते बम बाज़ारों में,
फिर भी मैं निडर होकर इस बाज़ारों से गुज़रता हूँ।।



ये कायर हैं करते हैं छुपकर वार,
हर बार लाल करते हैं ये मौत की तलवार,
मैं अब भी ज़िंदा हूँ दिल से,
क्या हुआ  जो मैं इस तलवार से हर बार मरता हूँ।  

अरे आतंकियों मेरा ये एलान सुन लो,
अपने छुपने के लिए अलग गली, अलग मकान चुन लो,
क्यूंकि अब भी मैं हर गली में तेरी मौत बन कर विश्वास से फिरता हुँ। 

मैं कोई एक आदमी नही, इस देश की जनता हूँ,
मैं ही विश्वास की बूंदो को मिलकर एक लहर बनाता हूँ,
हैं अगर हिम्मत तो आके भीड़ सामने से फिर देख मैं तेरा क्या हश्र करता हूँ। 

है नहीं मेरे देश की कमज़ोर नीव इतनी,
करले मेहनत हमे बांटने की तू जितनी,
मैं इंसान हूँ, बस इंसानियत का सम्मान करता हूँ,

है निकल रही जोश से हर आदमी की आवाज़ ये,
तय हो गया है तेरे अंत का अब आगाज़ ये,
ये दिल के कायर आतंकवाद, मैं बहादुर हूँ, तेरे वारो से नहीं डरता हूँ।
मैं फिर तुझे बता दूँ, मैं आतंकवाद से नहीं।।

Wednesday, 29 October 2014

है प्रणाम

है प्रणाम! उस सृष्टि को जिसका रूप निराला है,
जिसने सब कष्ट सहकर भी हमे ख़ुशी ख़ुशी पाला है।

 है प्रणाम! उस अम्बर को जिसका ह्रदय विराट है,
जिसके सामने झुका हर बड़ा सम्राट है।

है प्रणाम! उस उगते सूरज को जिसने जीने की आशा दी,
दूर हो गए साब गम और दूर हो गई जो निराशा थी।

है प्रणाम! डूबते सूरज को जिसने अपनी रौशनी चाँद को दी,
जिससे अन्धकार में रहे नहीं कोई कभी।

है प्रणाम! उस पेड़ को जिसने हमे है फल दिया,
खुद भूखा मर गया, हमे न मरने दिया।

है प्रणाम!उस नदी को जो निरंतर बहती रही,
हमारे द्वारा दिए कष्ट चुप चाप वो सेहती रही।

है प्रणाम! पर्वत को जो हमेशा अटल रहा,
हमे कोई आंच न आये इसलिए अविचल रहा।

है प्रणाम!उस धरती को जिसने जीवन भर हमारा साथ दिया,
मगर हमने अपनी धरती माँ को धर्म के नाम पर बाट दिया।

है प्रणाम!उस ईश्वर को जिसने हमे यह सब किया प्रदान,
उस करूणानिधि,विश्विधाता को शत- शत प्रणाम, शत-शत प्रणाम।।  

Friday, 22 August 2014

अच्छा लगता है

यूँ बेवजह किसी को अपना बनाना अच्छा लगता है.
कुछ भी सोच के यूँ मुस्कुराना अच्छा लगता है,
वो उठना सूरज के साथ और चाँद के साथ डूब जाना,
यूँ तारों के साथ जगमगाना ,
अच्छा लगता है।

तेरा साथ नहीं तेरी सोच काफ़ी है,
दिल टूटने के लिए एक खरोच काफी है,
ये यादों को बटोरने का ज़िम्मा उठा रखा है,
तेरी यादों को बो के जो कलियाँ खिल उठती हैं,
उन यादों की कलियों को सजाना,
अच्छा लगता है।

तेरा किया कोई एहसान होता तो शुक्रिया कहता,
तुझसे बिछड़ने का डर होता तो अलविदा कहता,
न जाने कितना कुछ है कहने को,
तू पास होती तो जाने क्या कहता,
वो अनकही बातों की चुभन दिल में छुपाना,
अच्छा लगता है।

रास्ते ना जाने आगे कितने हैं,
मकाम ना जाने आगे कितने हैं,
चलते चलते साथ तेरे न जाने कितनी मंज़िलें पाई हैं
जैसे लम्हों में मैंने सदियाँ बिताई हैं,
मगर यूँ जुदा हो कर तुझे पास बुलाना,
अच्छा लगता है.।।  

Friday, 31 January 2014

याद

कब से मिला नहीं हूँ तुझसे,
कब से यूँ ही बैठा हूँ,
कब से यादों में है तू मेरी,
कब से यादों से ये कहता हूँ,

क्या तुझे पता है दिल का मेरे हाल?
क्या तू भी रातों को करती है मेरा ख्याल?
क्या मुझे याद करके तेरी भी आखें नम हो जाती हैं?
तेरी परछाई कुछ कहती नहीं मुझसे,
बस शर्मा के गुम हो जाती है।

तेरी यादों का पीछा करता रहता हूँ मैं सदा,
हर कदम पर मुझे याद आती तेरी हर अदा ,
कब से तेरे साये का पीछा कर अब कितना दूर आ गया हूँ,
क्या बताऊँ तुझे हाल दिल का, मैं तो हसने की अदा भी भूल गया हूँ।

लोग कहते हैं तेरे जैसे आशिक प्यार नहीं पाते,
मेरी उम्मीद तोड़ कर कहते टूटी शाखों पे फूल नहीं आते।
ज़िन्दगी बेकार उनकी जो प्यार बिना जीते हैं,
मैं सुनता नही हूँ बात उनकी, वो घर जला कर शराब हैं।। 

Thursday, 30 January 2014

लिखता रहूँगा

एक ग़ज़ल लिखता हूँ, लिखता रहूँगा,
यूँ ही इन अक्षरों में दिखता हूँ, दिखता रहूँगा।

जाने किस जगह वो गाँव है,
रेत पर भी बिखरी ठंडी छाँव है,
माँ कि बनाई चप्पले हैं पाँव में,
फिर भी न जाने इन में क्यूँ घाव है।
भाप बन कर उड़ गई है  नमी आँखों कि,
यूँ धुप में सिकता हूँ, सिकता रहूँगा।।

 कुछ उम्मीदें बटोरने निकला था,
थोडा ही सही मगर प्यार बटोरने निकला था,
भटकता ही रह गया इन बाज़ारों में मैं तो,
जब थोड़ी आंस खरीदने निकला था।
इन चीज़ों कि तलाश में मैं खुद ही बिक गया,
इन बाज़ारों में  मैं रोज़ बिकता हूँ, बिकता रहूँगा।।

हर घूंघट की छोर में मैंने खुद को देखा,
हर रोज़ इस भोर में मैंने खुद को देखा,
वो रकीब मेरे होने पर शक़ करता है,
पर वीरानियों के शोर में भी मैंने खुद को देखा,
असीम रूपों में मैंने खुद को पाया है,
तू आँख कर बंद , मैं दिखता हूँ, दिखता रहूँगा।।

एक ग़ज़ल लिखता हूँ, लिखता रहूँगा।।

Tuesday, 16 July 2013

इश्क

इश्क में थोडा यूँ करने को जी करता है,
थोडा जीने को तो थोडा मरने को जी करता है,
इश्क में जैसे टूटी हुई माला की तरह बिखर जाऊं,
यूँ बिखर के थोडा सवरने को जी करता है।।

कभी अंधेरों में भी दूर कहीं वो लौ चमके,
और मीलो फैली ख़ामोशी में भी वो आवाज़ छनके,
वैसे दिल के खेल में प्यादा भी मेरे वज़ीर पर भारी है,
और हर पहर एक नए जशन की तैयारी है,
मौत तो चंद घड़ी की मेहमान अब तो लगती है,
अब ज़िन्दगी से थोडा डरने को जी करता है।।

वो मंदिर की घंटियाँ अब गवाही देंगी,
और वो मस्जिद के धागे अब रिहाई देंगे,
की कोई नुस्खा नही छोड़ा  है तुम्हे पाने का,
अब तो रस्ता ही नहीं पता वापस जाने का,
इन राहों पर चलते हुए बस ये जी करता है,
हर दफ़ा इश्क की गहराई में थोडा और उतरने को जी करता है।   
इश्क में थोडा यूँ करने को जी करता है,
थोडा जीने को तो थोडा मरने को जी करता है।।

Wednesday, 24 April 2013

शुरुवात..

एक दिन निकला मैं अनजान सी राहों में,
लेने किसी को अपनी आहों में, मगर
अब चलते-चलते बहुत दूर निकल आया हूँ
और अब भूल चूका हूँ की शुरुवात कहाँ से की थी।

उसकी आवाज़ की खनक को सुर मान के,
उसके चहरे की चमक को सूरज मान के,
बस वो सूरज पकड़ने निकल पड़ा हूँ,
मगर  अब भूल चूका हूँ की शुरुवात कहाँ से की थी।

शुक्र है खुदा की रस्ते में वो मिली,
बिना कुछ कहे बस साथ में चली,
मैं भी बस साथ उसके चलता रहा,
क्यूंकि मैं भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

रास्ते में मुझे सबने रुका,
हवायों ने रुका ,मंजिलों ने तो  दे दिया धोका
मगर मैं उसे देखकर  बस चलता रहा,
क्यूंकि मैं  तो भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

बस उसी को मैंने दिल दिया
उसके हर दर्द को दिल से जिया
शायद ये दर्द सहना मेरी रज़ा थी
मगर लोग बोले पागल ये तो तेरी सज़ा थी,
सुनाई ही नहीं दी मुझे औरों की बातें
क्यूंकि मेरे कानो में सिर्फ उसकी सदा थी,
अब भी बस साथ उसके चलता रहा
क्यूंकि मैं भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

एक दिन मैंने उससे कहा मेरा हाथ थाम लो, राहें आसान हो जाएँगी,
एक दिन हम पर भी ये किस्मत मेहरबान हो जाएगी,
वो बोली मैं ज़रूर चलती साथ तुम्हारे मगर ये राहें बहुत मुश्किल हैं,
दुनिया की रस्मे और कसमे इसमें शामिल हैं,
मैने उसे देखा और मुस्कुरा दिया,
क्यूंकि मैं भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

वो मुझसे बोली तुम भी वापस लौट जाओ अपनी राहों में,
और खुश रहो अपनी खुशनुमा अदाओं से,
ये सुन कर मैं शायद उसी पल लौट जाता,
मगर मैं तो  भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

आज खुश हूँ के साथ उसका प्यार है,
इकरार न सही कम से कम न साथ इनकार है,
यूँ ही मीलों चल सकता हूँ उसे देखते हुए
प्यार के मोती उसकी राहों में फ़ेकते हुए,
कुछ नंगे पाँव  चले के निशान देखकर भी अब आपस न जाऊँगा ,
क्यूंकि अगर वो साथ है तो मैं याद करना भी नहीं चाहोंगा,
की मैंने शुरुवात कहाँ से की थी।।

Friday, 12 April 2013

उड़ने को जी करता है

आज फिर उड़ने को जी करता है,
राहों में यूँ पीछे जाने को जी करता है। 

मेरे हिस्से का निवाला तेरी दावत नहीं,
यूँ फड-फाड़ा के जीना मेरी आदत नहीं।

दिल का परिंदा ये गगन चूमना चाहता है,
हाथ पकड़ घटाओं का ये आसमा घूमना चाहता है। 

तोड़ कर पिंजरों को ये पंख झटकना चाहता है,
अनजान राहों पर ये फिर भटकना चाहता है। 

ये पर्वत, ये नदिया मुझे बुलाते हैं,
और रात की चादर में मुझे तारे सुलाते हैं।

आज़ादी भी सच में चीज़ बड़ी निराली है,
तुझसे मांगी नहीं, मैंने आज ये कमा ली है। 

हाथ फैलाये स्वागत मेरा नया जहाँ करता है,
बेफिक्र-बेपरवा थोडा और उड़ने को जी करता है।।   

Friday, 5 April 2013

आशाओं की बिजली

शामो में एक सुबह छुपी रहती है कहीं,
उजालो में भी रातें बसी रहती हैं कहीं,
कुछ गमो के बादलों में आशाओं की बिजली होती है,
और बंजर खेत में भी नमी रहती है कहीं।

कभी आस्मा को भी धरती से मिलने की चाहत होती है कहीं,
और बर्फ में भी छुपी थोड़ी गर्माहट होती है कहीं,
कभी लफ़्ज़ों पर जज़्बात ठहर जाते है मगर
इन खामोशियों में एक आहत होती है कहीं।

ऐसे तो चाँद भी लाखों तारों में अकेला रहता है कहीं,
और चुपके से आखों से एक आसूं बहता है कहीं,
कभी एक इंसान ज़िन्दगी खुशहाल कर देता है,
और कभी भीड़ में भी अकेलेपन का एहसास रहता है कहीं।

यूँ तो सहारों की कमी नहीं राहों में मगर,
फिर भी इंसान बहक जाता है हर कहीं,
यूँ तो गम लिए सफ़र करता है मगर
फिर भी इंसान चहक जाता है हर कहीं,
दुखों के सागर में मुर्झाया सा रहता है,
मगर अपनों के चंद प्यार के अल्फाजों
से महक जाता है कहीं।।  

ऐसा देश बनाएँ

चलो मिलकर ऐसा देश बनाएँ,
जहाँ पर खुश रहे हर शख्स न कोई रो पाए,

ऍ मेरे वतन, तेरे सर की कसम 
खाते हैं हम, हम तुझे ऐसा देश बनायेंगे,
जहाँ नाम तेरा फक्र से लिया जाये।
ऍ मेरे वतन के लोगो, जागो, खोलो हाथ,
इससे पहले दम घुट जाये।।

अब मुझे चल चुकी है पता देश की एहमियत,
समझ आ गई है मुझे हकीकत,
बदल सकते है इस देश की तस्वीर हम,
जो साथ गर मिल जाएँ।

चलो मिलकर ऐसा देश बनाते हैं,
जहाँ अमीर-गरीब साथ चलें साथ खाएं।
जहाँ भाई-भाई में प्यार हो. 
न कोई दुल्हन दहेज़ के लिए जलाई जाये,
जहाँ किसान न मरे क़र्ज़ के तले,
न वो अपने परिवार को ज़हर खिलाये।

आओ इस वर्ष करें इसे देश का निर्माण,
जिसमे कश्मीर को कन्याकुमारी से मिलाया जाये।

हमने फैलाया है अब तक पाप इतना की,
दूषित हो गई है हमारे पाप धोते-धोते गंगा मैया,
तो फिर बताओ,
कहाँ जाकर नहाया जाये?

आओ इस वर्ष सारे मज़हब त्याग दें,
और सिर्फ एक मज़हब अपनाएं,
न रहे कोई हिन्दू-मुस्लिम,न सिख-इसाई,
चलो खुद को एक इंसान बनायें।

लाओ,अपने लहू में उबाल इतना,
जिससे हर बाँदा मरकर भी मरे नहीं, अमर हो जाये।

तू दिखा दे चल मौत को जज़्बा वो,
जो देख मौत ज़िन्दगी के सामने झुक जाये,
तू खुद में इतनी पवित्रता ला,
जो मेरे मरने पर गगन-आसमा लड़ जाएँ,
की तेरी आत्मा उसे मिले और वो पवित्र हो जाये।

हो गणतंत्र दिवस,या स्वतंत्रता दिवस,
तू गर्व से इसे इसे माना की, संग तेरे ये दिन सारा जहाँ मनाये।

ऐ वतन,दिल से दुआ है यही की बस देख लूँ एसा देश मैं और,
मेरी जां जय हिन्द कह सुकून से निकल जाये।।            

Monday, 25 March 2013

कुछ लिख रहा हूँ ...

टूटे हुए दिल के फ़साने लिख रहा हूँ,
जो गा न पाया कभी वो तराने लिख रहा हूँ,
बगैर प्यार के भी सदियाँ बिताई हैं हमने,
कैसे बीते वो ज़माने लिख रहा हूँ।

कुछ मशहूर किस्से हैं आशिकी के,
मगर हमारी तो बस छोटी सी कहानी है,
याद रखे हमारे बाद भी लोग हमें,
बस इसलिए अपने भी कुछ अफ़साने लिख रहा हूँ।।

वो हम पर जां निसार करते थे,
वो हम से बेंतेहान प्यार करते थे,
बस उनकी दौलत-ए-इश्क सम्भाल रक्खी है हमने,
और कहाँ छुपाए हैं जो खज़ाने लिख रहा हूँ।।

खुशियों में शामिल जहाँ था हमारे,
गैर प्यारे बन गए थे हमारे,
मगर गुमों ने सबके मुखोंते खोल दिए,
और अपने कौन निकले बेगाने लिख रहा हूँ।।

कुछ लफ़्ज़ों को ग़ज़ल कहा था हमने,
चंद पत्थरों को ताजमहल कहा था हमने,
जहाँ बैठ कर साथ वक़्त गुज़ारा था हमने,
कैसे हुए वीरां वो ठिकाने लिख रहा हूँ।।       

Sunday, 24 March 2013

#3

कभी यूँ दर्द सेहना अच्छा लगता है,
किसी बेगाने को अपना कहना अच्छा लगता है,
यूँ तो आसूँ निकलते हैं आँखों से हर शाम,
कभी कबार इस आँसुओं के साथ बहना अच्छा लगता है।। 
#2

इस इश्क के कई चहरे होते हैं,
खुली आँखों में भी सौ पहेरे होते हैं।
इतना आसाँ नहीं इश्क का दरिया पार करना,
कई मरतबा  इसके किनारे भी बहुत गहरे होते हैं।।   

हॉकी (HOCKEY)

सुनो दुनिया वालों, मैं भारत की तरफ से हॉकी खेलता हूँ,
अब क्या-क्या बताऊँ इस देश में मैं क्या-२ झेलता हूँ।

यहाँ  जाने क्यूँ राष्ट्रीय खेल का सम्मान नहीं होता,
यहाँ देश के खिलाडियों के पास खेलने को सामान नहीं होता।

अनजान सी ज़िन्दगी जीने को हम मजबूर होते हैं,
और यहाँ बस गेंद बल्ला पकड़ने वाले मशहूर होते हैं।

इस देश में अंजानो के हाथ खेल की सत्ता चलाई जाती है,
और भूखे खिलाडियों के चूल्हों में Hockey जलाई जाती है।

कहीं हार की कमाई भी हमारी जीत से ज्यादा है,
न जाने क्या खेल है ये, जहाँ राजा भी बना प्यादा है।

यहाँ तो गेंदों से गलियों में कॉच फूटते हैं,
और हॉकी के मैदानों में खिलाडियों के ख्वाब टूटते हैं।

एक सुनेहेरा सा ख्वाब था ध्यानचंद का वो ज़माना,
मुझे गर्व है इस खेल पर और मेरा फ़र्ज़ है इसे आगे बढ़ाना।

दस साल देश के लिए खेलने पर भी मुझे कोई नहीं जानता है,
और मेरा बेटा आज भी मुझसे किसी cricketer का autograph  मांगता है।।      

Friday, 22 March 2013

वाह क्या बात है!

गम से उठता है सूरज, दुखों के संग डूब जाता है,
चंदा भी युहीं डर-डर के अब तो बाहर आता है,
ग़मों में जागती है सुबह, अब दुखों से भरी रात है,
फिर भी गर्व से कहता है इंसा अपनी तो क्या बात है!

लबों पर रहती है प्यास और भूख पेट में मरती है,
अपने लाल को घर से निकालने में अब हर माँ डरती है,
मौत से भी बुरी हो चुकी अब ज़िन्दगी की हालत है,
फिर भी गर्व से कहता है इंसा अपनी तो क्या बात है!

अब तो किसी के पीठ में किसी का खंजर रहता है,
अब लोगों के होंठों से लालच का थूक बहता है,
करते बुराई उसकी हैं,सामने कहते साथ-साथ हैं,
फिर भी गर्व से कहता है इंसा अपनी तो क्या बात है!

उड़ गई दिल से हया, न मुह पर शर्म-लिहाज़ है,
अपनों से रूठा-रूखा अब अपनों का मिजाज़ है,
इश्वर समझता है खुद को, जानता नहीं उसकी क्या औकात है,
फिर भी गर्व से कहता है इंसा अपनी तो क्या बात है!

अब आदमी खुद से प्यार करता है,
और खुद के हुनर पर मरता है,
उसे लगता है की वो दुनिया को उस खुदा की सौगात है,
इसलिए शायद गर्व से कहता है इंसा अपनी तो क्या बात है!

खुद को खुद में बदल कर देख बना खुद को इंसा,
तू प्यार का दीपक बाँट सभी को, न कर किसी से इर्षा,
फिर मिलेगा तुझे प्यार सबका,
होगा वो भी अपना जो तेरे लिए अज्ञात है,
फिर तो पूरा संसार तुझसे कहेगा वाह आपकी क्या बात है!!  

Thursday, 21 March 2013

ज़िन्दगी...

ज़िन्दगी एक पहेली है,
ज़िन्दगी कभी दुःख का बाज़ार है,
तो कभी खुशियाँ अपरम्पार है।
ज़िन्दगी कभी खुशियों का समंदर है,
तो कभी दुखों का बवंडर है।
ये तो दुःख-सुख की सहेली है।
ज़िन्दगी एक पहेली है।।

ज़िन्दगी में कभी लहरों सा उछाल है,
तो कभी पर्वत सा ठहराव है।
ज़िन्दगी कभी सर्द हवा का झोका है,
तो कभी ज़िन्दगी आँखों का धोखा है।
ये कभी यादों की महफ़िल है,
तो कभी ये महफ़िल में भी अकेली है।
ज़िन्दगी एक पहेली है।।  

ज़िन्दगी कभी छुटपन की शरारत है,
तो कभी जवानी की शराफत है,
ये कभी बुढ़ापे की नजाकत है,
तो कभी इश्वर की इबादत है।
ज़िन्दगी बड़ी ही छैल-छाबेली है।
ज़िन्दगी एक पहेली है।।  

ज़िन्दगी कभी कलियों की नरमाहट है,
तो कभी शोलो सी गर्माहट है।
ये कभी सूरज जलाने की शक्ति है,
तो कभी गंगा की शीतल भक्ति है।
ज़िन्दगी कभी माँ का आँचल है,
तो कभी सूनेपन का आँगन है।
ज़िन्दगी कभी मरने की सज़ा है,
तो कभी जीने की वजह है।
ज़िन्दगी कैसे कैसे खेल खेली है।
ज़िन्दगी एक पहेली है।।

ज़िन्दगी जैसे सावन के झूले आये हों,
तो कभी जैसे पतझड़ में फूल मुरझाये हों।
ज़िन्दगी कभी सर्दी की पहली धुप है,
तो कभी रेगिस्तान सा बंजर रूप है।
ज़िन्दगी कभी बसंत में लहराती फसले  हैं,
तो कभी किसी शायर की अंतिम गज़लें हैं।
ये ज़िन्दगी बहुत अलबेली है।
ये ज़िन्दगी एक पहेली है।।    

Friday, 8 March 2013

सर झुकता है सजदे में और यूँ कलम हो जाता है

सर झुकता है सजदे में और यूँ कलम हो जाता है,
चाकू की नोक पर कहीं राम, कहीं अल्लाह बिठाया जाता है।

कभी प्यार के चंद लफ़्ज़ों से तख्ते पलट गए,
वहीँ आज मशालो से प्यार जलाया जाता है।

कभी हर कदम में भारत दिखता था,
अब तो बस झंडो के रंग में भारत पाया जाता है।

कभी सोने की चिड़िया पर सफ़र करता था भारत,
अब तो हर शख्स इस चिड़िया के पंख कुतर जाता है।

जहाँ राम के बिना रमजान नहीं और अली के बिना न दिवाली,
वहां आज गोलियों से दिवाली मानती है, और खून से देश नहाता है।

कभी कबीर,नानक,मुहम्मद के अल्फाजों में खुदा दिखता था,
अब तो बस इश्वर नोटों की गड्डियों में छुप जाता है।

कहाँ गुलामी के बोझ तले भी सब हाथ थामे खड़े थे,
वहीँ आज दो कदम साथ चलने में आदमी लडखडा जाता है।  

कभी माँ के आँचल में स्वर्ग और पैरों में जन्नत होती थी,
आज उसी माँ को बुढ़ापे में दर-दर भटकने को छोड़ दिया जाता है।

देश की हालत पर रो पड़ेगा एक दिन खुदा भी,
और बन्दों से पूछेगा, की मेरी बनाई धरती माँ को खून से क्यों नेहलाता है।।   

Wednesday, 6 March 2013

स्वर्ग में मोबाइल

अरे भई स्वर्ग में कमाल शुरू हो गया,
क्यूंकि अब स्वर्ग में मोबाइल का इस्तेमाल शुरू हो गया।

जब से स्वर्ग में लगा  मोबाइल कनेक्शन,
देवताओं ने चालू किया मोबाइल का सिलेक्शन।
अब तो देवता हर दम बतियाते हैं,
जिसकी वजह से सूरज देवता शाम की जगह रात को घर जाते हैं।

जब आता नहीं चाँद तो बच्चे सोचे की चंदा मामा क्यों रूठ गया?
अब उन्हें कौन समझाए की उन्हें अब आईडिया सूट हो गया।

लोग हैं परेशान, क्यों बरसा नहीं पानी?
अरे भई! क्योंकि इंद्र देव को भा गए अंबानी।

सब के पास है panasonic ,samsung, LG, nokia ,
हर स्वर्ग वासी बना मोबाइल का शौकिया।

मुम्बैया में बोले तो स्वर्ग की लग गई है वाट,
क्यूंकि अब सब के पास जो है hutch,reliance और smart. .

सारे देवता घंटो बतियाते हैं,
क्यूंकि वो फ़ोन का बिल जो नहीं चुकाते हैं।

सबसे पहले वायु देवता का नेटवर्क हुआ सेटल,
क्यूंकि वायु देवता ने नेटवर्क जो लिया है एयरटेल।

जल देवता ने बंद कर दिया बहना झरनों से,
नहीं तो उनका मोबाइल टूट जायेगा ज्यादा उप्पर से गिरने से।

अब सरे देवता प्रथ्वी की जल्द अपडेट पाते हैं,
क्यूंकि प्रथ्वी के उनके दूत उन्हें SMS के द्वारा सब बताते हैं।

चाहे जनता को स्वर्ग में मोबाइल कनेक्शन से जितनी परेशानी हो,
पर हम तो यही चाहते हैं की स्वर्ग में पहली मोबाइल दूकान हिंदुस्तानी हो।।             

Sunday, 3 March 2013

देखा जब उसको मैं खोया इस कदर,
न मुझे अपनी न ज़माने की रही कुछ खबर,
सोचता हूँ की उसे देखा न करूँ,
मगर रूकती नहीं मेरी ये गुस्ताख नज़र।

उसके नैनों की गहराई में खोना चाहूँ ,
उसकी जुल्फों की परछाई में सोना चहुँ,
उसे मालूम है मैं करता हूँ उसे इश्क बेइन्तेहा,
मगर उसे नहीं मेरी कुछ फ़िकर.
ऐ मेरे अल्लाह मुझे यह बता
क्या यूँही एक दिन फट जायेगा ये जिगर?

संगेमरमर सा तराशा वो बदन,
आखों के नूर की बहती हुई वो शबनम,
यादों में उसकी रोया इतना,
की उसकी यादों में तडपेगी मेरी कबर।
 ऐ दिल-ए-नादां मुझे यह बता,
क्यों मीठा लगता है मुझे हर ज़हर?

चाँद ने नुमाइश में फैलाया है दामन अपना,
धरती के आँचल में अब पूरा होगा मेरा सपना,
आने वाला है मिलन का वो दिन मगर,
ए  फिज़ा मुझे ये बता,
कब होगी वो रंगीन सुहानी सेहर।।