Friday, 22 August 2014

अच्छा लगता है

यूँ बेवजह किसी को अपना बनाना अच्छा लगता है.
कुछ भी सोच के यूँ मुस्कुराना अच्छा लगता है,
वो उठना सूरज के साथ और चाँद के साथ डूब जाना,
यूँ तारों के साथ जगमगाना ,
अच्छा लगता है।

तेरा साथ नहीं तेरी सोच काफ़ी है,
दिल टूटने के लिए एक खरोच काफी है,
ये यादों को बटोरने का ज़िम्मा उठा रखा है,
तेरी यादों को बो के जो कलियाँ खिल उठती हैं,
उन यादों की कलियों को सजाना,
अच्छा लगता है।

तेरा किया कोई एहसान होता तो शुक्रिया कहता,
तुझसे बिछड़ने का डर होता तो अलविदा कहता,
न जाने कितना कुछ है कहने को,
तू पास होती तो जाने क्या कहता,
वो अनकही बातों की चुभन दिल में छुपाना,
अच्छा लगता है।

रास्ते ना जाने आगे कितने हैं,
मकाम ना जाने आगे कितने हैं,
चलते चलते साथ तेरे न जाने कितनी मंज़िलें पाई हैं
जैसे लम्हों में मैंने सदियाँ बिताई हैं,
मगर यूँ जुदा हो कर तुझे पास बुलाना,
अच्छा लगता है.।।  

Friday, 31 January 2014

याद

कब से मिला नहीं हूँ तुझसे,
कब से यूँ ही बैठा हूँ,
कब से यादों में है तू मेरी,
कब से यादों से ये कहता हूँ,

क्या तुझे पता है दिल का मेरे हाल?
क्या तू भी रातों को करती है मेरा ख्याल?
क्या मुझे याद करके तेरी भी आखें नम हो जाती हैं?
तेरी परछाई कुछ कहती नहीं मुझसे,
बस शर्मा के गुम हो जाती है।

तेरी यादों का पीछा करता रहता हूँ मैं सदा,
हर कदम पर मुझे याद आती तेरी हर अदा ,
कब से तेरे साये का पीछा कर अब कितना दूर आ गया हूँ,
क्या बताऊँ तुझे हाल दिल का, मैं तो हसने की अदा भी भूल गया हूँ।

लोग कहते हैं तेरे जैसे आशिक प्यार नहीं पाते,
मेरी उम्मीद तोड़ कर कहते टूटी शाखों पे फूल नहीं आते।
ज़िन्दगी बेकार उनकी जो प्यार बिना जीते हैं,
मैं सुनता नही हूँ बात उनकी, वो घर जला कर शराब हैं।। 

Thursday, 30 January 2014

लिखता रहूँगा

एक ग़ज़ल लिखता हूँ, लिखता रहूँगा,
यूँ ही इन अक्षरों में दिखता हूँ, दिखता रहूँगा।

जाने किस जगह वो गाँव है,
रेत पर भी बिखरी ठंडी छाँव है,
माँ कि बनाई चप्पले हैं पाँव में,
फिर भी न जाने इन में क्यूँ घाव है।
भाप बन कर उड़ गई है  नमी आँखों कि,
यूँ धुप में सिकता हूँ, सिकता रहूँगा।।

 कुछ उम्मीदें बटोरने निकला था,
थोडा ही सही मगर प्यार बटोरने निकला था,
भटकता ही रह गया इन बाज़ारों में मैं तो,
जब थोड़ी आंस खरीदने निकला था।
इन चीज़ों कि तलाश में मैं खुद ही बिक गया,
इन बाज़ारों में  मैं रोज़ बिकता हूँ, बिकता रहूँगा।।

हर घूंघट की छोर में मैंने खुद को देखा,
हर रोज़ इस भोर में मैंने खुद को देखा,
वो रकीब मेरे होने पर शक़ करता है,
पर वीरानियों के शोर में भी मैंने खुद को देखा,
असीम रूपों में मैंने खुद को पाया है,
तू आँख कर बंद , मैं दिखता हूँ, दिखता रहूँगा।।

एक ग़ज़ल लिखता हूँ, लिखता रहूँगा।।

Tuesday, 16 July 2013

इश्क

इश्क में थोडा यूँ करने को जी करता है,
थोडा जीने को तो थोडा मरने को जी करता है,
इश्क में जैसे टूटी हुई माला की तरह बिखर जाऊं,
यूँ बिखर के थोडा सवरने को जी करता है।।

कभी अंधेरों में भी दूर कहीं वो लौ चमके,
और मीलो फैली ख़ामोशी में भी वो आवाज़ छनके,
वैसे दिल के खेल में प्यादा भी मेरे वज़ीर पर भारी है,
और हर पहर एक नए जशन की तैयारी है,
मौत तो चंद घड़ी की मेहमान अब तो लगती है,
अब ज़िन्दगी से थोडा डरने को जी करता है।।

वो मंदिर की घंटियाँ अब गवाही देंगी,
और वो मस्जिद के धागे अब रिहाई देंगे,
की कोई नुस्खा नही छोड़ा  है तुम्हे पाने का,
अब तो रस्ता ही नहीं पता वापस जाने का,
इन राहों पर चलते हुए बस ये जी करता है,
हर दफ़ा इश्क की गहराई में थोडा और उतरने को जी करता है।   
इश्क में थोडा यूँ करने को जी करता है,
थोडा जीने को तो थोडा मरने को जी करता है।।

Wednesday, 24 April 2013

शुरुवात..

एक दिन निकला मैं अनजान सी राहों में,
लेने किसी को अपनी आहों में, मगर
अब चलते-चलते बहुत दूर निकल आया हूँ
और अब भूल चूका हूँ की शुरुवात कहाँ से की थी।

उसकी आवाज़ की खनक को सुर मान के,
उसके चहरे की चमक को सूरज मान के,
बस वो सूरज पकड़ने निकल पड़ा हूँ,
मगर  अब भूल चूका हूँ की शुरुवात कहाँ से की थी।

शुक्र है खुदा की रस्ते में वो मिली,
बिना कुछ कहे बस साथ में चली,
मैं भी बस साथ उसके चलता रहा,
क्यूंकि मैं भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

रास्ते में मुझे सबने रुका,
हवायों ने रुका ,मंजिलों ने तो  दे दिया धोका
मगर मैं उसे देखकर  बस चलता रहा,
क्यूंकि मैं  तो भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

बस उसी को मैंने दिल दिया
उसके हर दर्द को दिल से जिया
शायद ये दर्द सहना मेरी रज़ा थी
मगर लोग बोले पागल ये तो तेरी सज़ा थी,
सुनाई ही नहीं दी मुझे औरों की बातें
क्यूंकि मेरे कानो में सिर्फ उसकी सदा थी,
अब भी बस साथ उसके चलता रहा
क्यूंकि मैं भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

एक दिन मैंने उससे कहा मेरा हाथ थाम लो, राहें आसान हो जाएँगी,
एक दिन हम पर भी ये किस्मत मेहरबान हो जाएगी,
वो बोली मैं ज़रूर चलती साथ तुम्हारे मगर ये राहें बहुत मुश्किल हैं,
दुनिया की रस्मे और कसमे इसमें शामिल हैं,
मैने उसे देखा और मुस्कुरा दिया,
क्यूंकि मैं भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

वो मुझसे बोली तुम भी वापस लौट जाओ अपनी राहों में,
और खुश रहो अपनी खुशनुमा अदाओं से,
ये सुन कर मैं शायद उसी पल लौट जाता,
मगर मैं तो  भूल चूका था की शुरुवात कहाँ से की थी।

आज खुश हूँ के साथ उसका प्यार है,
इकरार न सही कम से कम न साथ इनकार है,
यूँ ही मीलों चल सकता हूँ उसे देखते हुए
प्यार के मोती उसकी राहों में फ़ेकते हुए,
कुछ नंगे पाँव  चले के निशान देखकर भी अब आपस न जाऊँगा ,
क्यूंकि अगर वो साथ है तो मैं याद करना भी नहीं चाहोंगा,
की मैंने शुरुवात कहाँ से की थी।।

Friday, 12 April 2013

उड़ने को जी करता है

आज फिर उड़ने को जी करता है,
राहों में यूँ पीछे जाने को जी करता है। 

मेरे हिस्से का निवाला तेरी दावत नहीं,
यूँ फड-फाड़ा के जीना मेरी आदत नहीं।

दिल का परिंदा ये गगन चूमना चाहता है,
हाथ पकड़ घटाओं का ये आसमा घूमना चाहता है। 

तोड़ कर पिंजरों को ये पंख झटकना चाहता है,
अनजान राहों पर ये फिर भटकना चाहता है। 

ये पर्वत, ये नदिया मुझे बुलाते हैं,
और रात की चादर में मुझे तारे सुलाते हैं।

आज़ादी भी सच में चीज़ बड़ी निराली है,
तुझसे मांगी नहीं, मैंने आज ये कमा ली है। 

हाथ फैलाये स्वागत मेरा नया जहाँ करता है,
बेफिक्र-बेपरवा थोडा और उड़ने को जी करता है।।   

Friday, 5 April 2013

आशाओं की बिजली

शामो में एक सुबह छुपी रहती है कहीं,
उजालो में भी रातें बसी रहती हैं कहीं,
कुछ गमो के बादलों में आशाओं की बिजली होती है,
और बंजर खेत में भी नमी रहती है कहीं।

कभी आस्मा को भी धरती से मिलने की चाहत होती है कहीं,
और बर्फ में भी छुपी थोड़ी गर्माहट होती है कहीं,
कभी लफ़्ज़ों पर जज़्बात ठहर जाते है मगर
इन खामोशियों में एक आहत होती है कहीं।

ऐसे तो चाँद भी लाखों तारों में अकेला रहता है कहीं,
और चुपके से आखों से एक आसूं बहता है कहीं,
कभी एक इंसान ज़िन्दगी खुशहाल कर देता है,
और कभी भीड़ में भी अकेलेपन का एहसास रहता है कहीं।

यूँ तो सहारों की कमी नहीं राहों में मगर,
फिर भी इंसान बहक जाता है हर कहीं,
यूँ तो गम लिए सफ़र करता है मगर
फिर भी इंसान चहक जाता है हर कहीं,
दुखों के सागर में मुर्झाया सा रहता है,
मगर अपनों के चंद प्यार के अल्फाजों
से महक जाता है कहीं।।